चलते जाना ये मेरा कैसा सफ़र है...ना कोई मंज़िल, ना कोई राहगीर संग है...जिसे सोचा अपना बनाऊँ,उसने कहीं ना कहीं मुझे कमज़ोर समझा...ये उन मतलबी लोगों को क्या बताऊँ,मुझे सहारा नहीं, साथ चाहिए था...थक कर भी मुस्कुराते रहे हम,क्योंकि आँसुओं का भी अपना ए...
नैना हमेशा से प्यार की भूखी थी। वह कोई महल या दौलत नहीं चाहती थी, बस इतना चाहती थी कि कोई उसे अपना कहे। लेकिन ज़िंदगी ने उसे हर मोड़ पर ठुकराया।बचपन में पिता ने उसे बोझ समझा, रिश्तेदारों ने उसकी मजबूरियों का मज़ाक उड़ाया और जिन दोस्तों को वह अपना ...