नैना हमेशा से प्यार की भूखी थी। वह कोई महल या दौलत नहीं चाहती थी, बस इतना चाहती थी कि कोई उसे अपना कहे। लेकिन ज़िंदगी ने उसे हर मोड़ पर ठुकराया।
बचपन में पिता ने उसे बोझ समझा, रिश्तेदारों ने उसकी मजबूरियों का मज़ाक उड़ाया और जिन दोस्तों को वह अपना मानती थी, उन्होंने भी ज़रूरत पड़ने पर उसका साथ छोड़ दिया। फिर भी नैना हर बार टूटकर दोबारा खड़ी हो जाती।
कॉलेज में उसकी मुलाकात आरव से हुई। पहली बार उसे लगा कि कोई उसे समझता है। धीरे-धीरे दोनों एक-दूसरे के करीब आ गए। नैना ने अपने सारे दर्द, सारे राज़ उसके सामने खोल दिए। उसे लगा कि अब उसकी ज़िंदगी में अंधेरा खत्म हो जाएगा।
लेकिन वह गलत थी।
एक दिन उसे पता चला कि आरव ने उसके भरोसे और प्यार का इस्तेमाल केवल अपने मतलब के लिए किया था। उसके दोस्तों के बीच वह नैना की भावनाओं का मज़ाक उड़ाता था। यह जानकर नैना का दिल ऐसे टूटा जैसे किसी ने उसे भीतर से चीर दिया हो।
उस रात वह बहुत रोई।
लेकिन सुबह जब उसकी आँख खुली तो उसके आँसुओं की जगह एक अजीब-सी खामोशी ने ले ली थी।
उसने फैसला कर लिया कि अब वह किसी को अपनी कमजोरी नहीं बनने देगी।
नैना ने अपना पूरा ध्यान पढ़ाई और करियर पर लगा दिया। दिन-रात मेहनत की। जिन लोगों ने कभी उसका मज़ाक उड़ाया था, उन्हीं लोगों के सामने उसने अपनी सफलता की कहानी लिखनी शुरू कर दी।
कुछ साल बाद वही नैना एक बड़ी कंपनी की मालिक थी। उसके नाम से लोग प्रेरणा लेने लगे थे।
एक दिन एक समारोह में उसकी मुलाकात फिर आरव से हुई।
वह पहले जैसा आत्मविश्वासी लड़का नहीं था। उसकी आँखों में पछतावा साफ दिखाई दे रहा था।
"नैना, मुझे माफ़ कर दो," उसने धीमी आवाज़ में कहा, "मैंने तुम्हारे साथ बहुत गलत किया था।"
नैना मुस्कुराई।
यह मुस्कान जीत की थी, बदले की नहीं।
उसने कहा, "मैंने तुम्हें बहुत पहले माफ़ कर दिया था। क्योंकि तुम्हारे लिए नफ़रत रखने का मतलब था तुम्हें अपने दिल में जगह देना। और अब वहाँ तुम्हारे लिए कोई जगह नहीं है।"
आरव चुप रह गया।
नैना वहाँ से आगे बढ़ गई।
उस दिन उसे समझ आया कि सबसे बड़ा बदला किसी को रुलाना नहीं होता, बल्कि उसके दिए हुए दर्द के बावजूद इतना सफल और खुश हो जाना होता है कि उसका अस्तित्व आपके लिए मायने ही न रखे।
अब उसे लोगों से कोई उम्मीद नहीं थी।
उसने सीख लिया था कि उम्मीदें अक्सर दर्द देती हैं, लेकिन खुद पर भरोसा कभी धोखा नहीं देता।
उसकी ज़िंदगी में लोग आते रहे, जाते रहे, मगर अब वह किसी से जुड़कर खुद को खोती नहीं थी।
क्योंकि नैना जान चुकी थी कि दुनिया का सबसे मज़बूत रिश्ता वह होता है जो इंसान खुद से बनाता है।
और जिस दिन उसने खुद को अपना लिया, उसी दिन उसकी सारी अधूरी तलाश खत्म हो गई।