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एक छोटी चीज जो मुझे रोज खुश करती है

आर्या की ज़िंदगी बाहर से बिल्कुल सामान्य दिखती थी। नौकरी, घर, ज़िम्मेदारियाँ और रोज़ की भागदौड़। लेकिन उसके भीतर एक खालीपन था। उसे लगता था कि खुशी शायद किसी बड़ी उपलब्धि में छिपी है—अच्छी नौकरी, बड़ा घर या बहुत सारे पैसे।

हर सुबह वह जल्दी उठती, काम पर जाती और शाम को थकी हुई लौट आती। एक दिन दफ्तर जाते समय उसने सड़क किनारे एक छोटे से पौधे को देखा। वह पौधा टूटी हुई दीवार की दरार में उगा था। न कोई उसकी देखभाल करता था, न उसे पर्याप्त पानी मिलता था, फिर भी वह हरा-भरा था।

उस दिन आर्या ने बस यूँ ही उसे देखकर मुस्कुरा दिया।

अगले दिन फिर उसकी नज़र उसी पौधे पर पड़ी। उसने देखा कि उसमें एक नई कली निकल आई है। अब हर सुबह वह कुछ पल रुककर उसे देखने लगी। धीरे-धीरे यह उसकी आदत बन गई।

जब भी उसका दिन खराब होता, वह उस पौधे को याद करती। उसे लगता, "अगर यह छोटी-सी कली इतनी कठिन परिस्थितियों में भी बढ़ सकती है, तो मैं क्यों हार मानूँ?"

महीने बीत गए। एक दिन उस पौधे में छोटा-सा पीला फूल खिल गया। आर्या उसे देखकर इतनी खुश हुई जैसे कोई बड़ी जीत मिल गई हो।

उसी शाम उसे एहसास हुआ कि खुशी हमेशा बड़ी चीज़ों में नहीं छिपी होती। कभी-कभी वह एक छोटे से फूल में, किसी अनजान की मुस्कान में, सुबह की ठंडी हवा में या चाय की पहली चुस्की में भी मिल जाती है।

उस दिन से उसने अपने जीवन की छोटी-छोटी खुशियों को नोटिस करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उसका खालीपन कम होने लगा। परिस्थितियाँ वही थीं, चुनौतियाँ भी वही थीं, लेकिन उसका नज़रिया बदल गया था।

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