
रिया अपने बूढ़े पिता की इकलौती बेटी थी। उसकी माँ बचपन में ही गुजर गई थीं, इसलिए पिता ने ही माँ और पिता दोनों का प्यार दिया था। रिया का सपना था कि वह नौकरी करके अपने पिता को हर खुशी दे।
कई संघर्षों के बाद उसे एक अच्छी नौकरी मिल गई। पहली तनख्वाह मिलने पर उसने पिता से कहा, "पापा, अब आपकी सारी परेशानियाँ खत्म। मैं आपको दुनिया की हर खुशी दूँगी।"
पिता की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "मुझे कुछ नहीं चाहिए बेटा, बस तुम्हें खुश देखना चाहता हूँ।"
रिया ने अपनी पहली तनख्वाह से पिता के लिए एक सुंदर घड़ी खरीदी। वह बहुत उत्साहित थी। अगले दिन वह घड़ी लेकर घर लौट रही थी कि अचानक एक तेज़ रफ्तार ट्रक ने उसकी गाड़ी को टक्कर मार दी।
अस्पताल में रिया जिंदगी और मौत के बीच लड़ रही थी। पिता उसका हाथ थामे बैठे थे। रिया ने काँपती आवाज़ में कहा, "पापा... आपकी घड़ी... बैग में है... पहन लीजिएगा..."
पिता रो पड़े। "मुझे घड़ी नहीं चाहिए बेटा, मुझे तुम चाहिए।"
रिया हल्के से मुस्कुराई। उसकी आँखों से एक आँसू बहा और अगले ही पल उसकी पकड़ ढीली पड़ गई।
कुछ दिनों बाद पिता रोज़ वही घड़ी पहनकर उसके कमरे में बैठते। घड़ी की टिक-टिक उन्हें रिया की आवाज़ जैसी लगती थी।
एक दिन पड़ोसी ने पूछा, "भाई साहब, यह घड़ी इतनी खास क्यों है?"
पिता ने नम आँखों से कहा, "यह घड़ी समय नहीं बताती... यह मुझे हर पल याद दिलाती है कि मेरी बेटी अपनी सारी खुशियाँ मुझे देने आई थी, लेकिन अपनी जिंदगी ही दे गई।"
कमरे में फिर वही टिक-टिक गूँज रही थी, और एक पिता की अधूरी दुआ हमेशा के लिए अधूरी रह गई थी।