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शायरी

हमसे इतना भी दिल न लगाइए,

कि हमारे न रहने का आपको ग़म हो।

हम तो बारिश की उस बूंद की तरह हैं,

जो ज़मीन को छूकर कहीं खो जाती है।

क्या कहें अपने अकेलेपन का आलम,

अब तो किसी के साथ से भी खौफ़ लगता है।

कल तक जिन्हें अपना हमसाया समझते थे,

आज उनके साये से भी डर लगता है।

चार दिन की ज़िंदगी में किससे गिला करें,

हर रिश्ते का रंग बदलता नज़र आता है।

जो कभी अपना था इस दुनिया में सबसे ज़्यादा,

आज उसे पाने से भी डर लगता है।

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