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बिछड़ते रिश्ते

मैंने जाते-जाते जाना... कौन है अपना, कौन पराया

मैंने जाते-जाते जाना...

रिश्तों का हिसाब

खून से नहीं,

ज़रूरतों की स्याही से लिखा जाता है।

जिन हथेलियों को

मैंने अपनी दुनिया समझा था,

वहीं हथेलियाँ

मेरी उँगलियाँ छोड़कर

भीड़ में खो गईं।

और जो अजनबी थे,

जिनसे कभी

नाम तक का रिश्ता नहीं था,

उन्होंने मेरी चुप्पियों को

मेरी आवाज़ से पहले सुन लिया।

मैंने जाते-जाते जाना...

कि अपना वह नहीं

जो हर तस्वीर में साथ दिखे,

अपना तो वह है

जो तुम्हारी टूटी हुई तस्वीरों को भी

सीने से लगाकर रखे।

मैंने उम्र भर

कुछ चेहरों के लिए

अपने हिस्से की धूप बचाकर रखी,

पर जब मेरी शाम आई,

तो वही लोग

मेरे हिस्से का सूरज भी

अपने साथ ले गए।

उस दिन पहली बार समझ आया,

परछाइयाँ भी

रोशनी तक ही साथ चलती हैं।

अँधेरा आते ही

हर कोई

अपने घर लौट जाता है।

मैंने जाते-जाते जाना...

कि रिश्ते

कसमों से नहीं,

कठिन दिनों से पहचाने जाते हैं।

खुशियों में तो

सारा शहर अपना लगता है,

पर जब आँखों में

एक बूँद आँसू उतरती है,

तब पूरी दुनिया में

बस एक कंधा ही

घर जैसा लगता है।

मैंने कुछ लोगों को

अपने दुखों की चाबी दी,

उन्होंने मेरे दर्द का

तमाशा बना दिया।

और कुछ ऐसे भी मिले,

जिन्होंने बिना पूछे

मेरे बिखरे हुए शब्द समेट दिए,

जैसे कोई माँ

टूटे खिलौनों को भी

सँभालकर रखती है।

मैंने जाते-जाते जाना...

कि सबसे गहरी चोट

दुश्मनों से नहीं,

उन लोगों से मिलती है

जिन्हें हम

अपनी दुआओँ में

सबसे पहले याद रखते हैं।

मैंने देखा,

लोग कहते रहे—

"हम हमेशा साथ हैं।"

पर "हमेशा"

उनकी ज़ुबान पर था,

ज़िंदगी में नहीं।

जब मेरी नाव

भँवर में फँसी,

तो किनारे पर खड़े लोग

सलाह देते रहे,

हाथ किसी ने नहीं बढ़ाया।

तब समझ आया,

कुछ लोग

सिर्फ़ कहानी सुनने आते हैं,

कहानी बदलने नहीं।

मैंने जाते-जाते जाना...

कि अपना वह नहीं

जो तुम्हारी जीत पर ताली बजाए,

अपना तो वह है

जो तुम्हारी हार के बाद भी

तुम्हें हारने न दे।

मैंने उन आँखों में

अपना घर ढूँढ़ा,

जो मुझे देखकर मुस्कुराती थीं।

पर घर

दीवारों से नहीं बनता,

विश्वास से बनता है।

और विश्वास...

एक बार टूट जाए,

तो उसकी आवाज़

सारी उम्र

दिल में गूँजती रहती है।

अब मैं

किसी से शिकायत नहीं करता।

क्योंकि

समय ने सिखा दिया है—

हर मिलने वाला

अपना बनने नहीं आता,

कुछ लोग

सिर्फ़ पहचान बदलने आते हैं।

उन्होंने मुझे छोड़ दिया,

लेकिन जाते-जाते

मुझे मेरा सच दे गए।

अब अगर कोई पूछे—

"कौन अपना, कौन पराया?"

तो मैं बस इतना कहूँगा—

अपना वह है,

जो तुम्हारे टूटने पर

तुम्हें जोड़ने की कोशिश करे।

पराया वह नहीं,

जिससे खून का रिश्ता न हो।

पराया तो वह है,

जो तुम्हारे जीवित रहते

तुम्हें अकेला छोड़ दे।

और अंत में...

मैंने जाते-जाते जाना,

ज़िंदगी का सबसे बड़ा सच यही है—

कभी-कभी अपने,

सिर्फ़ रिश्तों में होते हैं...

और पराए,

दिल में घर बना लेते हैं।

यही जीवन का सबसे सुंदर,

और सबसे दर्दनाक परिचय है।

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