
रात के लगभग साढ़े ग्यारह बजे थे। पहाड़ों के बीच बसे छोटे से गाँव "बेलाघाट" में सन्नाटा ऐसा था कि हवा की सरसराहट भी साफ सुनाई देती थी।
नवीन, जो पेशे से फोटोग्राफर था, अपने दादा की पुरानी हवेली में कुछ दिनों के लिए रहने आया था। हवेली बहुत बड़ी थी, लेकिन उसमें सिर्फ दो ही खिड़कियाँ थीं। कम से कम, बचपन से उसने हमेशा यही देखा था।
पहली रात सब सामान्य रहा।
लेकिन दूसरी रात, जब वह अपने कमरे की लाइट बंद करके सोने ही वाला था, अचानक उसकी नज़र सामने की दीवार पर गई।
वहाँ... तीसरी खिड़की थी।
नवीन चौंककर उठ बैठा।
"ये कैसे हो सकता है?"
उसने टॉर्च जलाकर देखा।
दीवार बिल्कुल सपाट थी। कोई खिड़की नहीं।
वह मुस्कुराया, "शायद थकान की वजह से भ्रम हुआ होगा।"
लेकिन जैसे ही उसने लाइट बंद की...
तीसरी खिड़की फिर दिखाई दी।
और इस बार उसके बाहर कोई खड़ा था।
एक बूढ़ी औरत।
सफेद बाल, झुका हुआ शरीर, और चेहरा अंधेरे में छुपा हुआ।
नवीन का गला सूख गया।
उसने हिम्मत करके खिड़की के पास जाने की कोशिश की।
तभी बाहर खड़ी औरत ने धीरे-धीरे अपना हाथ उठाया और काँच पर तीन बार दस्तक दी—
ठक... ठक... ठक...
और फिर एक कर्कश आवाज़ आई—
"नवीन... इस बार मत खोलना..."
नवीन पीछे हट गया।
"इस बार?"
उसने डरते हुए पूछा, "कौन हो तुम?"
औरत ने धीरे-धीरे अपना चेहरा ऊपर उठाया।
नवीन के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
वह चेहरा उसी का था...
लेकिन बहुत बूढ़ा।
उसी समय उसके पीछे कमरे का दरवाज़ा अपने आप खुल गया।
और पीछे से किसी बच्चे की आवाज़ आई—
"दादा जी... खिड़की खोल दीजिए न... दादी बाहर ठंड में खड़ी हैं..."
नवीन धीरे-धीरे पलटा।
कमरे में एक आठ साल का लड़का खड़ा था।
लेकिन नवीन की कभी शादी ही नहीं हुई थी...
उस बच्चे के हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी।
उस तस्वीर में नवीन, वही बूढ़ी औरत, और वह बच्चा साथ खड़े मुस्कुरा रहे थे।
तस्वीर के पीछे लाल स्याही से केवल एक वाक्य लिखा था—
"अगर तीसरी खिड़की नहीं खुली... तो इस बार हम सब यहीं फँस जाएँगे..."
और उसी क्षण...
दीवार पर बनी तीसरी खिड़की के भीतर से किसी ने अंदर की ओर से दस्तक दी।
ठक... ठक... ठक...
क्योंकि...
बूढ़ी औरत तो अभी भी बाहर खड़ी थी।
तो फिर...
खिड़की के अंदर कौन था?