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सफर

चलते जाना ये मेरा कैसा सफ़र है...

ना कोई मंज़िल, ना कोई राहगीर संग है...

जिसे सोचा अपना बनाऊँ,

उसने कहीं ना कहीं मुझे कमज़ोर समझा...

ये उन मतलबी लोगों को क्या बताऊँ,

मुझे सहारा नहीं, साथ चाहिए था...

थक कर भी मुस्कुराते रहे हम,

क्योंकि आँसुओं का भी अपना एक असर है...

लोग बदलते रहे मौसम की तरह,

पर दिल आज भी वफ़ा की राह पर है...

Baatcheet