आज का विषय था गर्कलेपन में जो सीखा वो कोई और सिखा नहीं सकता।यह बात बिल्कुल सही है ।शुरू शुरू में हमें लगता है कि हम अकेले कुछ भी नहीं कर सकते ।हर समय हमें लोगों के साथ की जरूरत पड़ती रहती है ,लेकिन जब कभीबैदी परिस्थिति आती है जब हमें ही अकेले उसका...
Pcod या pcos आजकल ये दोनों नाम बहुत सुनने मिलते है।पीसीओडी और पीसीओस का मुख्य कारण है हमारा खानपान और जीवन शैली।जंक फूड जितने स्वादिष्ट होते हैं उतने ही स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी,यही मूल कारण है pcod और pcos का ।इससे निबटने के लिए हमे सलाद ,और ...

आज मैं वंदे भारत से यात्रा कर रही थी।सोचा था वही रोमांच महसूस होगा जैसे बचपन में होता था लेकिन यह यात्रा बचपन की वो यात्रा से कुछ अलग थी ।क्या अलग था इसमें ?ट्रेन में डिब्बे भी थे,यात्री भी थे ,रेडी वाले भी थे जो थोड़ी थोड़ी देर में कुछ न कुछ बेचन...

'पिकल बॉल ' एक खेल जो महानगरों जैसे नागपुर ,पुणे, हैदराबाद में आजकल बहुत चलन में है।इसे भी बैट और बॉल के साथ खेला जाता है लेकिन उसका बैट आम bat से अलग होता है ,यह आकर में छोटा और चौड़ा होता है ।इसकी बॉल प्लास्टिक की होती है जिस पर गड्ढे बने होते ह...

मैं कौन हूं।ये मैं भूल चली हूँ।बचपन में मेरे सारे फैसले माता जी और पिताजी लेते थे।उनके अनुसार खाना पीना ,आना जाना,उनके पसंद के कपड़े पहनना ,स्कूल जानाबड़ी होने के बाद शादी हुई ।सोच अब मै खुद की मर्ज़ी से जी सकूंगी लेकिन वहां भी मैं नहीं थी तुम थी ...

रिश्तेअब रिश्तों में वो बात नहीं रहीपहले जैसी मिठास नहीं रही।।मिलजुलकर जिया करते थे हमअब सिर्फ मैं,में और तुम ,तुम हो रही।।न कुछ मेरा था ,न कुछ तुम्हारा था।सब कुछ सबका था, ज़िंदगी थी अपनो से भरी।।अब परायों में अपने ढूंढने पड़ते हैं अपनो ने हम समझ ...

मैने अपनी पहली जॉब एक प्राइवेट स्कूल जो कि रेड हिल क्षेत्र हैदराबाद में है वह पर हिंदी की कक्षा शिक्षिका के तौर पर शुरू की थी।उस समय मेरा वेतन मात्र ४०००/- महीने था।उस समय मुझे यह अहसास ही नहीं हुआ कि मेरे कार्य भार की तुलना में यह वेतन बहुत ही कम...

यह कविता एक ऑटिज्म से जूझते बच्चे की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए लिखी गई है।जी रहा हूं इस कदरदुनिया ने किया मुझे बेदर न समझ सका मुझे कोईबस अलग हूं थोड़ा नहीं हूं बदतरउड़ना चाहता हूँ मैं भी लेकिन कतर दिए है मेरे परवो रौशनी हूँ मैं जिसे सभी ने कलं...

'दो बैलों की कथा ' आज तकरीबन २५ सालों बाद मुझे यह कहानी पढ़ने का मौका मिला ।मैं कक्षा ९ की एक छात्रा को ट्यूशन देती हूं इनको इस साल से गंगा पाठयपुस्तक पढ़नी है।जिसका प्रथम पाठ ही है दो बैलों की कथा ।इस कहानी को मैने बचपन में पढ़ा था ।मुंशी प्रेमचं...

यही था आज का विषय ,सोचा इस विषय पर मैं भी अपने विचार व्यक्त करूं। वैसे तो कई किताबें मैं पड़ी है लेकिन ऐसी किताब जिसने मेरी सोच बदल दी वो किताब है - ' ज़िंदगी की किताब ' .... ये किसी किताब का नाम नहीं बल्कि मेरी , आपकी और हम सब की अपनी किताब है ,ज...

मैं हालात हूँ, सब कुछ सिखा देता हूँ।जब मैं संवरता हूँ तो नसीब खुल जाते हैं,जब मैं रूठ जाऊँ तो खुशियों के दरवाज़े बंद हो जाते हैं।अरमान सजाते हैं लोग हर किस्म के,गर मुझसे टकरा जाए तो मुकम्मल कर दूँ या वजूद ही मिटा दूँ।मेरे कमज़ोर पड़ते ही लोग ज़िम्मेदा...

फ़ुरसतसोचती हूँ कि ज़रा ये काम निपटा लूँफिर थोड़ा आराम करूँगीसुकून से चाय का मज़ा लूँगीअपने आप से भी कुछ बातें कर लूँगी।मगर एक के बाद एक, ज़िम्मेदारियों ने मुझे इस कदर घेराकि मैं तो भूल गई खुद का ही चेहराजब शीशे में देखा खुद को तो,अचानक से पूछ बैठ...

हर कोई दोस्त नहीं होता ,दोस्त जैसा भी तो कोई नहीं होताहर रिश्ते की बुनियाद है दोस्तीयूँ ही तो हर किसी पर भरोसा नहीं होताभूल जाते है अपनों को ,जब दोस्त साथ होते हैगैरों से इतना गहरा नाता यूँ ही नहीं होता।बिन बोले जो समझे बातसाथ निभाए हर वक्त दिन हो...
