
आज मैं वंदे भारत से यात्रा कर रही थी।
सोचा था वही रोमांच महसूस होगा जैसे बचपन में होता था लेकिन यह यात्रा बचपन की वो यात्रा से कुछ अलग थी ।क्या अलग था इसमें ?
ट्रेन में डिब्बे भी थे,यात्री भी थे ,रेडी वाले भी थे जो थोड़ी थोड़ी देर में कुछ न कुछ बेचने के लिए यहां से वहां आवागमन करते रहते थे।
फिर क्या अलग था।बहुत विचार किया तब अहसास हुआ कि अब यात्रियों में वो अपना पन नहीं था ।अब सिर्फ अपनी ही दुनिया में लगे हुए थे और वो दुनिया थी मोबाइल की दुनिया बच्चे हों या बड़े सब का साथी ,रिश्तेदार,दोस्त और कोई नहीं सिर्फ मोबाइल था ।
वो हंसने के पल मोबाइल की रील में ही दबे थे।किसी को बाहर की प्राकृतिक सुंदरता देखने में कोई दिलचस्पी नहीं थी।
सच में कितना कुछ खो दिया हमने।