
फ़ुरसत
सोचती हूँ कि ज़रा ये काम निपटा लूँ
फिर थोड़ा आराम करूँगी
सुकून से चाय का मज़ा लूँगी
अपने आप से भी कुछ बातें कर लूँगी।
मगर एक के बाद एक, ज़िम्मेदारियों ने मुझे इस कदर घेरा
कि मैं तो भूल गई खुद का ही चेहरा
जब शीशे में देखा खुद को तो,
अचानक से पूछ बैठी कौन हो तुम
स्तब्ध सी खड़ी रह गई, मैं कहीं गुम हो गई
तलाशने की ज़रूरत है खुद को
हाँ, एक पल खुद के लिए भी जीने की ज़रूरत है मुझको।