
मैने अपनी पहली जॉब एक प्राइवेट स्कूल जो कि रेड हिल क्षेत्र हैदराबाद में है वह पर हिंदी की कक्षा शिक्षिका के तौर पर शुरू की थी।
उस समय मेरा वेतन मात्र ४०००/- महीने था।
उस समय मुझे यह अहसास ही नहीं हुआ कि मेरे कार्य भार की तुलना में यह वेतन बहुत ही कम है।
मेरी मजबूरी थी इसलिए मैने या वेतन स्वीकार किया ।
उस समय मेरी बेटी की उम्र ६ साल की थी ।मेरा घर स्कूल से २५ किलोमीटर दूर था ।
बहुत परेशानियों के साथ मैने वो दिन गुजारे थे ।
बस में धक्के खा कर घर पहुंचना और घर पहुंचते हो घर का सारा काम करना ,बच्चे को देखना और सासू जी का कोई साथ नहीं देना यह सब बातें मेरे अंदर झुंझलाहट पैदा करती चली गई नतीजा झगड़े बढ़ने लगे ।
उस विद्यालय के प्रधानाचार्य भी अपने शिक्षकों से नौकर जैसा व्यवहार करते थे।
जैसे तैसे मैने वो जॉब छोड़ी ।
इस सब परिस्थितियों ने यह सिखाया कि अपने लिए लड़ना सीखो ।जितना दबोगे ये दुनिया उतनी ही दबाएगी।
तुम स्वयं अपनी कदर कर सकते हो कोई और नहीं।