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अनदेखी रौशनी

यह कविता एक ऑटिज्म से जूझते बच्चे की भावनाओं को ध्यान में रखते हुए लिखी गई है।

जी रहा हूं इस कदर

दुनिया ने किया मुझे बेदर

न समझ सका मुझे कोई

बस अलग हूं थोड़ा नहीं हूं बदतर

उड़ना चाहता हूँ मैं भी

लेकिन कतर दिए है मेरे पर

वो रौशनी हूँ मैं जिसे सभी ने कलंक माना

अपनों ने भी गैर माना और हो गए किनारा तर

टूट कर भी बिखरा नहीं मैं

थोड़ा सा प्यार पाने को भटक रहा हूं दर दर

मेरी भी है ख्वाहिशें हज़ार

इन अधूरे सपनों को पूरा करना चाहता हूँ मगर

न समझा कोई इतनी सी बात

कि ख़ास हूँ में,खास है मेरा मुकद्दर

कि ख़ास हूँ में,खास है मेरा मुकद्दर

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