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मैं

मैं कौन हूं।ये मैं भूल चली हूँ।

बचपन में मेरे सारे फैसले माता जी और पिताजी लेते थे।उनके अनुसार खाना पीना ,आना जाना,उनके पसंद के कपड़े पहनना ,स्कूल जाना

बड़ी होने के बाद शादी हुई ।सोच अब मै खुद की मर्ज़ी से जी सकूंगी लेकिन वहां भी मैं नहीं थी तुम थी ।

फिर जिम्मेदारियां बढ़ी तो भी मै कहीं नहीं मिली जैसे मैं थी ही नहीं ।हमेशा अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करना ।अपनी खुद की भी कोई पसंद ,नापसंद होती है यह भी भूल चली थी ।

जब इतना सब कुछ देने के बाद कुछ पल सोचने बैठी तो अचानक से मैं सामने आया और बोला ,पहचाना मुझे यह मैं हूँ ।अब समय है खुद के लिए जियो वापस अपने मैं से मिलो ।

क्योंकि अब तुम्हे ही तुम्हारी जरूरत है।

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