
रिश्ते
अब रिश्तों में वो बात नहीं रही
पहले जैसी मिठास नहीं रही।।
मिलजुलकर जिया करते थे हम
अब सिर्फ मैं,में और तुम ,तुम हो रही।।
न कुछ मेरा था ,न कुछ तुम्हारा था।
सब कुछ सबका था, ज़िंदगी थी अपनो से भरी।।
अब परायों में अपने ढूंढने पड़ते हैं
अपनो ने हम समझ लिया हमें बैरी।।
हम कुछ भी कहे तो लगता है ताना
रूठे हमसे यों जैसे अमावस की हों रात्रि।।
हमने तो तुमसे अच्छा व्यवहार ही किया
बदले में मिली सिर्फ नफरती निगाहों की कटारी।।
बस अब सहा नहीं जाता यह अपमान
बिखरे आत्मसम्मान की यह राख की ढेरी।।
तुम अपनी दुनिया में रहो,हम अपनी दुनिया में
न किसी को किसी से कोई मतलब हो यही है इस समय की बात पूरी।।