कहां से लाऊं वो सुकून भरी नींदजो माँ के घर आती थी,माँ के आँचल मेंसारी दुनिया समाती थी।उनकी एक मुस्कान देखमैं अपनी हर तकलीफ़ भूल जाती थी,माँ ही तो मुझे जीने कासही ढंग सिखलाती थी।जब भी ज़िंदगी थका देती है,याद माँ की ही आती है,उनकी वो मीठी बातेंआज भी...

ये घर, है कैसा घर?जो बन तो गया, पर बसा नहीं,दीवारें खड़ी हैं चारों ओर,पर इनमें कोई हँसा नहीं।कमरे तो सज गए सब यहाँ,पर सुकून कहीं भी ठहरा नहीं।ईंट-पत्थरों से बना ये घर,जहाँ रिश्तों का कोई पहरा नहीं।खिड़कियाँ खुली हैं रोशनी को,पर दिलों में उजाला आया...
