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ये घर, है कैसा घर...??

ये घर, है कैसा घर?
जो बन तो गया, पर बसा नहीं,
दीवारें खड़ी हैं चारों ओर,
पर इनमें कोई हँसा नहीं।

कमरे तो सज गए सब यहाँ,
पर सुकून कहीं भी ठहरा नहीं।
ईंट-पत्थरों से बना ये घर,
जहाँ रिश्तों का कोई पहरा नहीं।

खिड़कियाँ खुली हैं रोशनी को,
पर दिलों में उजाला आया नहीं,
सब साथ रहते हैं इस घर में,
पर कोई किसी का साया नहीं।

रसोई में अब भी चूल्हा है,
पर वैसी खुशबू आती नहीं,
माँ के हाथों की वो गर्माहट,
किसी थाली में अब पाती नहीं।

आँगन आज भी वैसा ही है,
पर बच्चों की वो दौड़ नहीं,
हँसी की गूँज जो बसती थी,
अब उसकी कोई ओट नहीं।

धीरे-धीरे समझ में आया,
घर दीवारों से बनता नहीं,
जहाँ दिलों में दूरी बस जाए,
वो मकान तो होता है... घर नहीं।

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