Back to feed

आम आदमी की डायरी

हम आम आदमी हैं साहिब,

हमारी डायरी में

ना विदेश घूमने के सपने होते हैं,

ना बड़ी-बड़ी गाड़ियों की ख्वाहिश।

हमारी डायरी में लिखा होता है —

माँ की दवाई,

बच्चों की फीस,

बहन की शादी,

और महीने के आखिर तक

घर चलाने की चिंता।

हम उम्र भर

कर्ज़ ही उतारते रह जाते हैं —

कभी पैसों का,

कभी रिश्तों का,

तो कभी उन उम्मीदों का

जो लोग हमसे लगाए बैठे होते हैं।

और इन्हें पूरा करते-करते

एक दिन चुपचाप

हम खुद के लिए जीना छोड़ देते हैं।

Baatcheet