कलयुग हों या सतयुग हमेशा एक औरत को ही सताया अग्नि परीक्षा देने को क्यु उसे मजबूर बनाया अपनी पवित्रता साबित करने पर भी गलत उसे ढहटाया, सब हार गये जुये मे तो बोली एक औरत की लगाई भरी सभा मे खिसकर आँचल उसका अहंकार अपना दिखाया क्या गलती थी उस स्त्री की...

संसार का सफर काफी सुहाना था नदियों के संग समुद्र दीवाना था इनलंबे लम्हों में आसमान का सहारा था दर्द भरे इन पलो में मजबूत पहाड़ों का साथ था बढ़ते इस सफर में जंगलों का खौफ था बातो ही बातों में हवा का जोकाऐसे आया जैसे मानो उसी का दौर था
