
कलयुग हों या सतयुग हमेशा एक औरत को ही सताया अग्नि परीक्षा देने को क्यु उसे मजबूर बनाया अपनी पवित्रता साबित करने पर भी गलत उसे ढहटाया, सब हार गये जुये मे तो बोली एक औरत की लगाई भरी सभा मे खिसकर आँचल उसका अहंकार अपना दिखाया क्या गलती थी उस स्त्री की जिसने जीवन भर पतिवरता धर्म निभाया गुना किसी और ने किया और पत्थर की शिला उसे बनाया देखते ही देखते कलयुग का दोर आया अब वो भी उड़ने चली थी थक हार कर दुनिया से अपने सपने पिरोने लगी थी जैसे ही उसने बाहर कदम बठाया एक राक्षस का झुंड आया और उसके जीवन को तार तार कर आक्रोस अपना दिखाया एक बार फिर दुनिया ने गलत एक औरत को ही ढेराया