अब वो दौर वो रुतबा वो असर ना रहा.जो था कभी शहर मैं वो कहर ना रहा..जहाँ पैदा हुये पले और बड़े हुये हैं हम.आज क्यों लग रहा मेरा वो शहर ना रहा..आ जाता हूँ देखने मैं मल्कियत बाप की.मकान मौजूद है वहीं पर वो घर ना रहा..कायम है वो जमीं दिवारें और छप्पर भी...

जानवरों से बुरा,मनुजों का आज भाग(भाग्य) है.जंगलों से ज्यादा लगी,शहरों में नफरती आग है..आग से बचने को घर,छोड़ें तो फिर जायें कहाँ.माली की नजरों के आगे,जलता रहा यह बाग है..सियारों की एका के आगे,सिंह भी बेबस हुये हैं.हर मोड़ पर डसने मुझे,बैठा कोई काला ...
