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जंगलों से ज्यादा लगी,शहरों में नफरती आग है

जानवरों से बुरा,मनुजों का आज भाग(भाग्य) है.

जंगलों से ज्यादा लगी,शहरों में नफरती आग है..

आग से बचने को घर,छोड़ें तो फिर जायें कहाँ.

माली की नजरों के आगे,जलता रहा यह बाग है..

सियारों की एका के आगे,सिंह भी बेबस हुये हैं.

हर मोड़ पर डसने मुझे,बैठा कोई काला नाग है..

ना दिवाली नृत्य दिखता,ना होता है फगुआ कहीं.

सबकी अलग हैं ढपलियां,सबका अलग राग है..

कट गये समाज जब से,और बंट गये परिवार जी.

तब से श्राद्ध खाने को,आता ना घर पर काग है..

कथाओं से अधिक तो,व्यथाएँ यहां पर चल रहीं.

हर सफेद चोगे के ऊपर,लगा एक काला दाग है..

पापियों के पाप के आगे,गंगा भी अब बेबस हुई.

तभी तो गंगाजल में पारस,दिखने लगा झाग है..

✍️कवि शारदा प्रसाद तिवारी पारस

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