
अब वो दौर वो रुतबा वो असर ना रहा.
जो था कभी शहर मैं वो कहर ना रहा..
जहाँ पैदा हुये पले और बड़े हुये हैं हम.
आज क्यों लग रहा मेरा वो शहर ना रहा..
आ जाता हूँ देखने मैं मल्कियत बाप की.
मकान मौजूद है वहीं पर वो घर ना रहा..
कायम है वो जमीं दिवारें और छप्पर भी.
हकीकत कहूँ हमारा कहीं बसर ना रहा..
डरता हूँ बात करने में मैं छोटों से अपने.
जो बसाया था मन उनके वो डर ना रहा..
वो कमाते रहे सिक्के मैं मुस्कान बच्चों की.
यही कारण है अब उनके बराबर ना रहा..
अब जब पूंछती बिटिया कब घर जायेंगे.
सवाल छोटा सा ही है मगर उत्तर ना रहा..
हुआ अपने ही घर में अब मेहमान पारस.
रिस्ते की रिस्तेदारी का वो कदर ना रहा..
✍️कवि शारदा प्रसाद तिवारी पारस
हीरानगरी पन्ना 488001म.प्र.