पीड़ाओं के दर्पण गढ़ के पग -पग पर सजा लिए मैंने, पग छालों के प्रतिबिंबो से यह रक्तपात भीषण करके पीड़ाओं के.... इक बूंद हथेली पर गिरकर बेबस नयनों को खाली कर, टूटे - फूटे स्वर में निकले वे विरह वेदना के अक्षर, तुम न देते तो अच्छा था अपनी विवशता का उ...

वो कोना दिल काखाली था जोतुम्हारे आने से पहलेवीरान हो गया हैतुम्हारे जाने के बाद।ऐसा नहीं है किसफ़र में अकेली हूंख़ुशी भी है,ग़म भी हैआंसू भी है, हंसी भी हैपर न जाने क्यूंबस रात उदास हैतुम्हारे जाने के बाद।बहुत समझदार हो गई हूं अब ,करती नहीं ज़्यादा ...
