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पीड़ाओं के दर्पण...

पीड़ाओं के दर्पण गढ़ के

पग -पग पर सजा लिए मैंने,

पग छालों के प्रतिबिंबो से

यह रक्तपात भीषण करके

पीड़ाओं के....

इक बूंद हथेली पर गिरकर

बेबस नयनों को खाली कर,

टूटे - फूटे स्वर में निकले

वे विरह वेदना के अक्षर,

तुम न देते तो अच्छा था

अपनी विवशता का उत्तर,

हम जी लेंगे निज अधरों पे

अपनी चीखें ख़ुद ही सी के।।

पीड़ाओं के दर्पण....

मृतप्राय पड़ी सुधबुध खोकर

अपमानित प्रीत की चौखट पर

वो दूर से जो रंगीली थी

काली स्याही की चादर पर

श्वासों के बंधन तोड़ भी दे

आराध्य मेरे इतना तो कर

कर विदा मुझे अब जाऊं मैं

घावों से यह आंचल भरके।।

पीड़ाओं के दर्पण.....

ज्योति मिश्रा

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