किसी अनजाने से मिली हु,वैसे तो अनजानो से बात करना पसंद नहीं मुझे,मगर 'वो ' अनजान होकर भी अनजान न था,कुछ अपना सा है उसमें,अपना तो नहीं, मगर अपनों से भी शायद कुछ ज्यादा है,जानना चाहता है,वो मेरे बारे में,मगर क्या बताऊ मै उसको अपने ही बारे में,कुछ सच...
वो बेटा माँ का लाडला,पिता का शहजादा था,बाज़ी के लिए शाजिल,छुटकी के लिए उसका भाई उसका सबसे बड़ा रक्षक था,अनुज के लिए वो राम का धनुष था,अपनी प्रियसी के लिए वो प्रियवर प्राणनाथ था!पर इतना ही काफ़ी न था,इसपर भी वो एक सैनिक था,और सबसे प्यारा उसको अपना यही...