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अनजाना भाग 1

किसी अनजाने से मिली हु,

वैसे तो अनजानो से बात करना पसंद नहीं मुझे,

मगर 'वो ' अनजान होकर भी अनजान न था,

कुछ अपना सा है उसमें,

अपना तो नहीं, मगर अपनों से भी शायद कुछ ज्यादा है,

जानना चाहता है,

वो मेरे बारे में,

मगर क्या बताऊ मै उसको अपने ही बारे में,

कुछ सच बताना चाहता है,

कुछ बातें वो मुझको समझाना चाहता है,

अपने अनुभव से,

वो मुझको भी जीना सिखाना चाहता है,

बिल्कुल निस्वार्थ, निश्छल मन से,

वो मुझको जीवन का रहस्य समझाना चाहता है,

कभी मिलु उसे,

तो पूछूंगी,

क्यों वो ऐसा है,

बिल्कुल निश्छल, निर्मल

गंगा सा है,

कोई न है जैसा,

आखिर क्यों वो वैसा है?

पागल सी बाते भी वो मेरी सुनता है,

जाने कैसे वो मुझको समझता है,

मै भी नहीं जानती शायद जितना खुद को,

वो उतना मुझको,

जानना चाहता है!

मुझमे वो खुद को देखता है,

जाने क्यों वो,

मुझे वो उस सा समझता है,

जाने क्यों?

Gauri sarda

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