आदमी एक-दूसरे से कितना जलता है,कितनी ईर्ष्याओं की चिंगारियाँअपने ही आँगन में पलता है।वह भूल जाता है —कि आग पहले हाथों को जलाती है,फिर घरों को,और अंत में रिश्तों की छाँव को भीधीरे-धीरे राख बनाती है।आज का समय भीअजीब दर्पण लेकर खड़ा है —जहाँ मुस्कानो...
जिसने माँ की थकी हथेली कोअपने माथे से रोज़ लगाया,जिसने पिता की झुकती कमर कोअपना सहारा बनकर संभाला।जिसने सास–ससुर में भीमाँ–बाप का ही रूप देखा,जिस बहू ने हर ताने सहकर भीघर का हर दीपक स्नेह से रेखा।वही बेटा… वही बहूआज समाज की आँखों में कटघरे में हैं...