आदमी एक-दूसरे से कितना जलता है,
कितनी ईर्ष्याओं की चिंगारियाँ
अपने ही आँगन में पलता है।
वह भूल जाता है —
कि आग पहले हाथों को जलाती है,
फिर घरों को,
और अंत में रिश्तों की छाँव को भी
धीरे-धीरे राख बनाती है।
आज का समय भी
अजीब दर्पण लेकर खड़ा है —
जहाँ मुस्कानों के पीछे
प्रतिस्पर्धा की धधकती आँच है,
और सफलता की सीढ़ियों पर
किसी की हार की राख पड़ी है।
सोशल जगत की चमक में
मन का अँधेरा गहरा हो जाता है,
दूसरे की रोशनी देखकर
मनुष्य भीतर ही भीतर
जलता चला जाता है।
पर कोई यह क्यों नहीं सोचता —
कि राख होने की यह यात्रा
सबको एक-सी बना देती है;
न पद रहता, न प्रतिष्ठा,
बस समय की हवाओं में
उड़ती हुई एक मुट्ठी धूल रह जाती है।
आओ, इस आग को
ईर्ष्या से नहीं,
सृजन से जलाएँ;
ताकि राख नहीं,
प्रकाश बने हमारा अंत।
क्योंकि सच तो यही है —
सिर्फ़ राख होने के लिए
आदमी एक-दूसरे से
बहुत ज़्यादा जलता है।
✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन