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शीर्षक: “झूठ के मुखौटे”

जिसने माँ की थकी हथेली को

अपने माथे से रोज़ लगाया,

जिसने पिता की झुकती कमर को

अपना सहारा बनकर संभाला।

जिसने सास–ससुर में भी

माँ–बाप का ही रूप देखा,

जिस बहू ने हर ताने सहकर भी

घर का हर दीपक स्नेह से रेखा।

वही बेटा… वही बहू

आज समाज की आँखों में कटघरे में हैं,

और जो अवसर के व्यापारी थे

वे सम्मान के सिंहासन पर खड़े हैं।

बहन के घर के आँगन से

जो रिश्ते फूल बनकर आए थे,

वही बहन के बेटे–बेटी

मामा–मामी की इज़्ज़त को

बाज़ार में नीलाम कर जाए थे।

जिस दामाद को घर का बेटा समझा,

जिसे विश्वास का अन्न खिलाया,

उसी ने चालाकी के काग़ज़ों से

विश्वास का दीप बुझाया।

बहन के पति ने धोखा ऐसा दिया

कि स्नेह का घर ही लूट लिया,

और समाज की चौपाल में जाकर

अपने हाथों को धुला हुआ कह दिया।

झूठ का उजला मुखौटा पहन

वे सच के प्रहरी बन बैठे,

और माँ के उस सच्चे बेटे को

दगाबाज़ का नाम दे बैठे।

काग़ज़ों की चालों में

ममता का आँगन हार गया,

और सेवा में जीवन देने वाला

समाज की नज़रों में अपराधी ठहर गया।

पर सच की लौ बुझती नहीं,

वह राख में भी जलती रहती है—

जो चोर थे वे सम्मान ओढ़े हैं,

पर भीतर से लज्जा पलती रहती है।

इतिहास गवाह बनेगा एक दिन—

झूठ की दीवारें गिर जाएँगी,

और माँ के उस सच्चे बेटे की

चुप पीड़ा ही सच्चाई कहलाएगी।

✍️ लेखनाधिकार सुरक्षित: डॉ. नीरू मोहन

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