वो जो चौखट पर ठिठकी हुई एक बेनाम दस्तक है,शायद मेरे मुक़द्दर की वही तस्वीर है।माँ के होठों की लाली, जब ज़ख़्मों को छुपाती है,तवायफ़ की वह बेटी, हर रात मर जाती है।मैं खिलौनों से नहीं, घुँघरुओं की खनक से जागी हूँ,मैं अपनी ही परछाईं के साये से भागी ह...

वो शहर आज भी ज़िंदा है,जहाँ रातें सिर्फ़ अँधेरा नहीं ओढ़तीं,बल्कि चीखों को दफ़्न करके सोती हैं।जहाँ हर गली के मोड़ परएक खामोशी लटकी मिलती है,और दीवारों पर सूखे हुए धब्बेकिसी मासूम की आख़िरी कहानी कहते हैं।वो फूल,जिसे खिलना था किसी बगिया में,आज किस...
वो जो चौराहे पर खड़ा, एक नन्हा सा कंधा है,उसकी आँखों में बचपन नहीं, बस पेट का धंधा है।हाथों की लकीरें उसकी, कालिख से भर गई हैं,शायद ख़्वाहिशें उसकी, भूख के डर से मर गई हैं।तुम जिसे 'सस्ता मज़दूर' कह कर बुलाते हो,दो रुपए बचाकर, खुद को बड़ा बताते हो।उसक...
