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नज़रों का अँधेरा

वो शहर आज भी ज़िंदा है,

जहाँ रातें सिर्फ़ अँधेरा नहीं ओढ़तीं,

बल्कि चीखों को दफ़्न करके सोती हैं।


जहाँ हर गली के मोड़ पर

एक खामोशी लटकी मिलती है,

और दीवारों पर सूखे हुए धब्बे

किसी मासूम की आख़िरी कहानी कहते हैं।


वो फूल,

जिसे खिलना था किसी बगिया में,

आज किसी दरिंदे की उँगलियों में

काँटों-सा उलझा पड़ा है।


तुम्हारी हवस,

अब सिर्फ़ जिस्म तक सीमित नहीं रही,

वो रूह की तहों में उतरकर

इंसानियत को कुतरने लगी है।


तुम कहते हो मर्द हो?

तो सुनो—

मर्दानगी कभी किसी की चीखों पर नहीं पलती,

वो तो किसी की हिफ़ाज़त में साँस लेती है।


वो छोटी बच्ची,

जिसकी दुनिया गुड़ियों से आगे बढ़नी ही नहीं थी,

तुमने उसके सपनों के पैरों में

दरिंदगी की बेड़ियाँ बाँध दीं।


उसकी आँखों में अब भी सवाल है—

“क्या मेरी गलती बस इतनी थी,

कि मैं पैदा हुई एक औरत बनकर?”


और तुम...

हर बार अपने गुनाहों को

कपड़ों की लंबाई में छुपा देते हो,

जैसे इज़्ज़त कोई कपड़ा हो,

जो शरीर से गिरते ही मर जाती है।


सुनो,

इज़्ज़त जिस्म में नहीं होती,

वो तो नज़रों में बसती है—

और तुम्हारी नज़रें तो कब की मर चुकी हैं।


जब तुम उसे तोड़ते हो,

तो सिर्फ़ एक शरीर नहीं टूटता,

एक पूरी दुनिया बिखर जाती है—

माँ की ममता, पिता का विश्वास,

और खुदा का वो भरोसा,

जो उसने इंसान पर किया था।


तुम्हारे हाथों पर जो खून है,

वो सिर्फ़ एक जिस्म का नहीं,

वो हर उस रिश्ते का है,

जिसे तुमने अपनी हवस में कुचल दिया।


और याद रखना—

हर चीख जो तुमने दबाई है,

वो एक दिन तूफ़ान बनकर लौटेगी।


वो दिन दूर नहीं,

जब ये खामोश शहर

तुम्हारे नाम से काँपेगा नहीं,

बल्कि तुम्हारे ख़िलाफ़ उठ खड़ा होगा।


क्योंकि अब खामोशी भी थक चुकी है,

अब आँसू भी आग बन चुके हैं।


और जिस दिन

हर औरत अपनी “ना” को

तलवार बना लेगी,

उस दिन तुम्हारी सारी मर्दानगी

धूल में मिल जाएगी।


फिर मत कहना,

कि तुम्हें चेताया नहीं गया था—

हर दबी हुई आवाज़

एक इंक़लाब की जननी होती है।


और वो इंक़लाब

अब जन्म ले चुका है।

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