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सपनों की नीलामी

वो जो चौराहे पर खड़ा, एक नन्हा सा कंधा है,

उसकी आँखों में बचपन नहीं, बस पेट का धंधा है।

हाथों की लकीरें उसकी, कालिख से भर गई हैं,

शायद ख़्वाहिशें उसकी, भूख के डर से मर गई हैं।

तुम जिसे 'सस्ता मज़दूर' कह कर बुलाते हो,

दो रुपए बचाकर, खुद को बड़ा बताते हो।

उसके नन्हे पैरों ने, कभी मख़मल नहीं देखा,

उसने सिर्फ़ तपती सड़कों का, जलता मंजर देखा।

जब तुम्हारे बच्चे, महँगे खिलौनों से खेलते हैं,

वो कचरे के ढेर में, अपनी रोटी झेलते हैं।

किताबों की खुशबू क्या है, उसे पता भी नहीं,

उसकी तक़दीर में शायद, कोई ख़ुदा भी नहीं।

ढाबे के उस कोने में, जो बर्तन धोता है,

वो रात को अक्सर, सूखी आँखों से सोता है।

साहब की डाँट और गालियाँ, उसकी लोरी हैं,

उसकी मासूमियत की यहाँ, सरेआम चोरी है।

वो जो ईंटों की भट्टी में, अपना खून जलाता है,

तुम्हारे आलीशान बंगलों की, दीवारें बनाता है।

मगर खुद की छत उसकी, आज भी टपकती है,

ज़िंदगी उसकी, अंधेरी कोठरी में सिसकती है।

तुम कहते हो— "देश तरक्की की राह पर है,"

मगर देखो तो सही, बचपन कहाँ तबाह पर है?

जिस उम्र में उसे, परियों की कहानी सुननी थी,

उस उम्र में उसने, समझौतों की चादर बुनी थी।

ऐ समाज! तू इन मासूमों का गुनहगार है,

यहाँ इंसानियत नहीं, बस पैसों का बाज़ार है।

जिस दिन ये छोटे हाथ, कलम उठा लेंगे,

समझ लेना, वो अपनी तकदीर खुद बना लेंगे।

वो जब सिग्नल पर रुकती, स्कूल की बस को देखता है,

अपनी मटमैली पलकों में, 'सपनों का अर्थी' देखता है।

तुम्हारे बच्चे हाथ हिलाते, खिड़की के उस पार से,

वो बस चाय का कप थमाता, अपने झूठे प्यार से।

एक ही उम्र, एक सा बचपन, पर ये कैसा फासला है?

एक के लिए बस्ता भारी, एक के लिए 'कचरे का थैला' है।

दीवाली के उजालों में, जब शहर झिलमिलाता है,

वो अंधेरे कोने में बैठ, बस पटाखे बनाता है।

तुम्हारी खुशियों के बारूद में, उसकी साँसें जलती हैं,

तारीखें बदलती हैं मगर, उसकी रातें कहाँ ढलती हैं?

वो जो खुद दीपक बनाता, उसके घर में अँधेरा है,

बाज़ार की इस रौनक में, बस मुफ़लिसी का बसेरा है।

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