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AI से 80 का दशक

AI से अस्सी के दशक का फोटो तो बनवा लोगे तुम,

पर उस दौर की इंसानियत कहाँ से लाओगे तुम?

AI से अस्सी के दशक का पहनावा तो अपना लोगे तुम,

पर उस दौर की सादगी कहाँ से लाओगे तुम?

मिट्टी के आँगन, कच्चे घर फिर से बना लोगे तुम,

पर उन आँगनों का अपनापन कहाँ से लाओगे तुम?

चौपालों की तस्वीरें AI से खूब सजा लोगे तुम,

पर चौपालों वाली वो आत्मीयता कहाँ से लाओगे तुम?

पड़ोसी के सुख में खुश, दुःख में साथ निभा लोगे तुम,

पर बिना स्वार्थ के रिश्ते कहाँ से लाओगे तुम?

रेडियो, कैसेट और पुराने गीत फिर बजा लोगे तुम,

पर साथ बैठकर सुनने का वो सुकून कहाँ से लाओगे तुम?

पुराने रिश्तों की तस्वीरें तो फिर बना लोगे तुम,

पर रिश्तों में वो गर्माहट कहाँ से लाओगे तुम?

बचपन की गलियों का दृश्य फिर दिखला दोगे तुम,

पर उन गलियों की वो मासूमियत कहाँ से लाओगे तुम?

AI से बीता हुआ ज़माना फिर से बना लोगे तुम,

हर चीज़ का पुराना रंग भी सजा लोगे तुम।

मगर याद रखना—सिर्फ तस्वीरों से दौर नहीं लौटता,

वो दौर बनाने वाला इंसान कहाँ से लाओगे तुम?

चेहरे, कपड़े, घर और गलियाँ तो बना लोगे तुम,

पर उस दौर जैसा दिल कहाँ से लाओगे तुम?”

✍️इंजीनियर राजन सोनी

अम्बेडकर नगर,

AI से 80 का दशक

उत्तर प्रदेश

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