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घरौंदे

Hindi

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मैं बचपन में घरौंदे बनाया करता था,

जब मुझे मालूम नहीं था कि दुनिया में युद्ध भी होता है!

बमों से भय भी उगता है!!

तब मैं घूमता था

पेड़ों के बीच,

फूलों की क्यारियों से गुजरता हुआ,

पक्षियों के गीत सुनता था

और रात को तारों की छाँव में,

दूधिया चाँदनी से सराबोर वातावरण में,

चाँद को निहारते हुए सो जाता था!

मगर अब

मैं दिन में बंकर खोदता हूँ

और

पूरा दिन इस भय के साथ गुज़ारता हूँ

कि रात में कोई बम

मेरा बंकर तोड़कर मुझे

अंतिम नींद सुलाने न चला आए!

बचपन का घरौंदा

बंकर में बदल चुका है!

सारे पक्षी कहाँ गुम हो गए!!

(30/12/2001)______बेंगलुरु प्रवास की एक रचना।

आपका

रुख़सार (इलाहाबाद से)।

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