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कवि

कवि उन आवाज़ों को सुनता है

जो हमें सुनाई नहीं देतीं।

अंतर का शोर,

बाहर का कोलाहल

हमें एकाग्र कहाँ होने देता है!

झंझट, खींचतान और ताम-झाम

हमें सादगी से, मासूमियत से

और प्रकृति से दूर ले जाकर

पाखंडियों, छलियों

और लफ्फाज़ों के मकड़जाल

में फँसा देते हैं।

दूर जंगलों से एक सनातन पुकार

एक संदेश के साथ बुलाती है।

जो चिट्ठियाँ भेजी जाती हैं आकाशों से,

पक्षी उनका जाप करते हैं,

हमें अपनी ओर आकर्षित करना चाहते हैं।

चिट्ठियाँ खो जाती हैं,

हम बहरों की तरह,

अंधों की तरह

जीवन जीते हैं!

जीवन वृक्षों के झुरमुट से,

फूलों की सुगंध के माध्यम से

हमसे संवाद करना चाहता है,

मगर हम हैं कि

हमें समय ही नहीं मिलता

उस संवाद से संवाद करने का,

जो वृक्षों से आती हुई हवा में

छिपा हुआ है।

अफ़सोस!

हमारे पास समय नहीं है!

हमारी बिसात ही क्या—

आँधियाँ तेज़ हैं,

दीया बुझने को है,

मगर ज़िद है कि

दीया जलता रहे,

हवा चलती रहे!

जंगलों में एक फुसफुसाहट गूँजती है—

आदम की संतान को क्या हो गया है?

हाय, आदम की संतान का भाग्य!

यह किस यात्रा पर है?

इसे तो अपनी भी ख़बर नहीं!

मगर अभी भी हमारे और जंगलों के बीच

एक जीवित प्राणी है,

जो कहासुनी में लगा हुआ है—

वह कवि है, जो!

— रुख़सार अहमद फ़ारूक़ी

(गोंती वाला)

23/08/2026

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