
शीशे पार का इंसान
तुमने जो भेजा है लाल रंग का इमोजी,
वह मेरी स्क्रीन पर चमकता तो है,
पर मेरी हथेली को गर्म नहीं करता।
हम एक ऐसी दुनिया में आ गए हैं,
जहाँ शब्द तैरते हैं,
लेकिन उनकी सुगंध हवा में गायब है।
हमने पिक्सेल में तलाश ली है दुनिया,
और भूल गए हैं—
कि किसी हथेली का पसीना
दूसरी हथेली की घबराहट चुरा लिया करता था।
एक 'नोटिफिकेशन' कभी
किसी के अचानक घर आ जाने की धड़कन नहीं बन सकता,
और 'वॉइस नोट' की लहरें कभी
कांपते हुए होंठों की चुप्पियों को नाप नहीं सकतीं।
हमने तस्वीरें संभाल कर रखी हैं,
लेकिन उस छुअन की यादें कहाँ हैं,
जो बिना किसी आवाज़ के
रूहे-शरीर के सारे ज़ख्म सिल दिया करती थी?
काँच का यह पर्दा कितना भी
साफ़ हो,
यह दो आत्माओं के बीच
एक अभेद्य दीवार है।
अगर सच में महसूस करना है मुझे,
तो इस स्क्रीन को बुझा दो।
अपनी उंगलियों से नहीं,
अपनी मौजूदगी से मुझे छुओ—
क्योंकि परमात्मा ने इंसान को मिट्टी का बनाया था,
काँच का नहीं।
इंजीनियर राजन सोनी
अम्बेडकर नगर, उत्तर प्रदेश