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माँ-बाप होते हुए भी… 🌹

🌹 माँ-बाप होते हुए भी… 🌹

✍️ डॉ. सुरक सेल्वी चिन्नप्पन

हर तरफ़ छोटे-छोटे बच्चे दिखते हैं,

किसी के हाथ में कटोरा है,

किसी की आँखों में सवाल…

और किसी के पेट में

दो वक्त की रोटी भी नहीं।

सबसे बड़ा दर्द तो तब होता है,

जब बच्चा भूखा हो

और उसके माँ-बाप उसके पास ही हों…

फिर भी उसकी भूख

उनकी मजबूरी से बड़ी हो जाए।

एक नन्हा-सा बच्चा

सड़क किनारे बैठकर रोटी को देखता है,

जैसे रोटी कोई खिलौना नहीं,

उसकी पूरी दुनिया हो।

वो क्या जाने

गरीबी क्या होती है,

मजबूरी क्या होती है…

वो तो बस इतना जानता है—

“माँ, मुझे भूख लगी है…”

और माँ…

अपनी आँखों के आँसू छुपाकर

कह देती है—

“बस बेटा, थोड़ी देर और…”

उस “थोड़ी देर” में

न जाने कितनी रातें गुजर जाती हैं,

कितनी माताएँ अपने बच्चों को

भूखा सुलाती हैं,

और कितने पिता

अपनी बेबसी को

सीने में दबाकर सो जाते हैं।

जिस उम्र में

बच्चों के हाथ में किताब और खिलौने होने चाहिए,

उसी उम्र में

उनके हाथों में कटोरा क्यों है?

जिस उम्र में

माँ की गोद सबसे सुरक्षित जगह होनी चाहिए,

उसी उम्र में

वो सड़क को अपना घर क्यों समझें?

माँ-बाप होना ही काफी नहीं,

कभी-कभी हालात

माँ-बाप की ममता को भी

रोटी नहीं दे पाते।

लेकिन हमें भी

सिर्फ़ देखकर आगे नहीं बढ़ जाना चाहिए।

आइए…

किसी बच्चे को देखकर

सिर्फ़ उसकी गरीबी पर अफ़सोस न करें।

अगर सामर्थ्य हो,

तो उसके हाथ में

एक निवाला रख दें,

एक किताब दे दें,

और शायद…

उसके भविष्य को

भीख नहीं,

एक मौका दे दें।

क्योंकि

हर बच्चा भूख लेकर पैदा नहीं होता,

लेकिन हमारी बेरुख़ी

उसे भूखा रहने पर मजबूर कर सकती है।

और याद रखिए—

आज जिस बच्चे के हाथ में कटोरा है,

कल उसी हाथ में किताब भी हो सकती है।

आज जिसे हम मदद का पात्र समझते हैं,

कल वही देश का सहारा बन सकता है।

🌹 Moral:

बच्चे किसी भी समाज का भविष्य होते हैं।

उनकी भूख पर सिर्फ़ आँसू बहाना काफी नहीं—

उन्हें भोजन, शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान देना

हम सबकी सामाजिक ज़िम्मेदारी है।

एक बच्चे का पेट भरना

सिर्फ़ खाना देना नहीं,

उसके भीतर के बचपन को बचाना है।

क्योंकि एक बच्चे को बचाना,

सिर्फ़ एक जीवन बचाना नहीं—

एक पूरे भविष्य को बचाना है। 🌹

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