
देखो कितनी बड़ी हो गईं बेटियाँ,
बन के रक्षक खड़ी हो गईं बेटियाँ।
दुनिया जिसको कमजोर समझती रही,
वो तूफानों से भी भिड़ गईं बेटियाँ।
जब अपनों पर संकट की छाया पड़ी,
ढाल बनकर अड़ी रह गईं बेटियाँ।
अपने सपनों को पीछे रखकर फिर,
अपनों के लिए सबसे लड़ गईं बेटियाँ।
अबला जिसको दुनिया बुलाती रही,
घर की नाजुक कली ही समझती रही।
जब भी ज़रूरत पड़ी देश को कहीं तो,
सीना ताने वहीं खड़ी हो गईं बेटियाँ।
माँ का आँचल, पिता का अभिमान हैं,
दुनिया को मिला जिनसे सम्मान है।
कठिनाइयों से जो अब डरती नहीं,
हर चुनौती से बड़ी हो गईं बेटियाँ।
✍️ इंजीनियर राजन सोनी