
जहाँ शब्द प्रथम आएँ,
भाव छान दिए जाएँ,
संवेदनाएँ तर्कों की तुला पर
और कर्तव्यों को कसौटी बताया जाए।
अधिकारों पर कालिख पोतकर,
रिश्तों को वर्गीकृत कर दिया जाए –
कहानी ऐसी हो,
जहाँ मध्यांतर आते-आते
स्वयं को ही शीर्षक बना दिया जाए।
ऐसी दुनिया से चलकर आती हूँ,
पैरों के घाव दिख न जाएँ
उन पर मेहंदी रचाकर आई हूँ।
आँखों का सूनापन उभर न आए,
गहरे रंगों का चश्मा लगाकर आई हूँ।
जीवन में कुछ और तो नहीं,
मगर अभिनय में
परिपक्व होकर आई हूँ।
@अर्शिया अंजुम