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कविता – परिपक्वता

जहाँ शब्द प्रथम आएँ,

भाव छान दिए जाएँ,

संवेदनाएँ तर्कों की तुला पर

और कर्तव्यों को कसौटी बताया जाए।

अधिकारों पर कालिख पोतकर,

रिश्तों को वर्गीकृत कर दिया जाए –

कहानी ऐसी हो,

जहाँ मध्यांतर आते-आते

स्वयं को ही शीर्षक बना दिया जाए।

ऐसी दुनिया से चलकर आती हूँ,

पैरों के घाव दिख न जाएँ

उन पर मेहंदी रचाकर आई हूँ।

आँखों का सूनापन उभर न आए,

गहरे रंगों का चश्मा लगाकर आई हूँ।

जीवन में कुछ और तो नहीं,

मगर अभिनय में

परिपक्व होकर आई हूँ।

@अर्शिया अंजुम

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