एक माँ का बेटा…
कल तक जिस आँगन में
शहनाइयाँ गूँज रही थीं,
आज उसी घर में
सिसकियाँ दफ़्न हो गईं...
एक माँ ने
जिस बेटे को नौ महीने कोख में रखा,
उँगली पकड़कर चलना सिखाया,
आज उसी बेटे की तलाश
मिट्टी के नीचे पूरी हुई...
एक पिता की आँखों के सपने,
एक बहन की राखी,
एक भाई का सहारा...
सब एक पल में
खामोश हो गया।
सोचता हूँ...
क्या इतना सस्ता हो गया है
इंसानी जीवन?
अगर रिश्ता बोझ लगने लगे,
तो सच बोल दो...
अगर साथ निभाना मुश्किल हो,
तो सम्मान से अलग हो जाओ...
लेकिन किसी की साँसें छीनकर
किसी का भविष्य मत दफ़नाओ।
शादी सात फेरों का वादा है,
विश्वास की डोर है,
दो परिवारों का सम्मान है...
यह कोई खेल नहीं,
जहाँ मन बदला
और किसी की ज़िंदगी खत्म कर दी।
आज एक माँ रो रही है...
एक पिता टूट गया है...
एक परिवार उम्रभर
उस दरवाज़े को देखेगा
जो अब कभी नहीं खुलेगा।
याद रखो...
हर बेटा किसी माँ का संसार होता है,
हर भाई किसी बहन की ताकत,
हर इंसान किसी परिवार की धड़कन।
ज़िंदगी एक बार मिलती है।
उसे छीनने का अधिकार
किसी इंसान को नहीं।
आओ रिश्तों को निभाना सीखें,
धोखा नहीं...
सम्मान से अलग होना सीखें,
हत्या नहीं...
क्योंकि शादी प्यार, विश्वास और ज़िम्मेदारी का नाम है—
किसी की आख़िरी साँस का नहीं। :::
यह कविता हर उस परिवार को समर्पित है जिसने किसी अपने को हिंसा में खोया है। ईश्वर ऐसी पीड़ा किसी भी माँ-बाप को कभी न दे।
यह कविता जामनगर की एक दर्दनाक घटना से प्रेरित है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष पर निर्णय देना नहीं, बल्कि मानव जीवन, विवाह और रिश्तों के महत्व का संदेश देना है।