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भारत माता के जख्म

एक भावपूर्ण देशभक्ति कविता:

भारत माता के ज़ख्म

— विजय शर्मा ऐरी

कल रात एक सपना आया, मन को बहुत रुलाया। मेरे सम्मुख भारत माता थीं, पर उनका रूप था मुरझाया।

सफेद धवल थी उनकी साड़ी, लेकिन उस पर दाग थे लाल। मानो पीड़ा की गाथा लिखते, अनगिन घावों के थे जाल।

मैंने झुककर शीश नवाया, फिर काँपते स्वर में पूछा, "माँ! यह किसने घाव दिए हैं? किसने तेरा दिल है नोचा?"

माता बोलीं, आँखें नम थीं, वाणी में था दर्द अपार, "ये घाव किसी दुश्मन ने नहीं, दिए हैं मेरे ही संतानों ने बार-बार।

धर्म के नाम पर बँटवारे, जाति के ऊँचे-नीचे खेल, आरक्षण पर कटुता फैली, नफरत ने तोड़े कितने मेल।

राजनीति के स्वार्थ भरे रण, भ्रष्टाचार का काला जाल, मुनाफाखोरी की अंधी दौड़, कर गई मुझे लहूलुहान।

कोई भाषा पर लड़ता है, कोई प्रदेशों में बाँट रहा, अपना ही घर जला-जला कर, मुझसे खुशियाँ छीन रहा।"

इतना कहकर माता रोईं, देख न पाया उनका दर्द। माँ के आँसू बनकर बहता, मानो गंगा का पावन नीर।

तभी अचानक दृश्य बदला, आए वीर अनेक महान, सीने पर गोली खाने वाले, भारत माँ की सच्ची शान।

कोई भगत सिंह सा दिखता था, कोई था आज़ाद समान, कोई सीमा पर सोया था, बनकर भारत की पहचान।

वे माता के घावों पर, प्रेम का मलहम लगा रहे थे, अपने त्याग और बलिदानों से, उनको फिर से सजा रहे थे।

मैंने पूछा, "माँ! कब होंगे ये सारे ज़ख्म तुम्हारे दूर?" माता बोलीं, "उस दिन होगा मेरा जीवन फिर भरपूर।

जब हर बच्चा सबसे पहले भारतीय कहलाएगा, धर्म, जाति से ऊपर उठकर देश को गले लगाएगा।

जब नेता सेवा को समझेंगे, सत्ता का केवल खेल नहीं, जनता का विश्वास निभाएँगे, स्वार्थ का कोई मेल नहीं।

जब रिश्वत लेने वाला सोचे, देश का मैं नुकसान न करूँ, जब व्यापारी उचित मूल्य लेकर जनहित का सम्मान करूँ।

जब शिक्षक केवल नौकरी नहीं, राष्ट्र निर्माता कहलाएँगे, जब युवा अपने कर्मों से भारत का मान बढ़ाएँगे।

जब मजदूर, किसान, सैनिक, सबको समान सम्मान मिलेगा, जब हर बेटी सुरक्षित होगी, तब मेरा हर घाव भरेगा।

जब मंदिर-मस्जिद से पहले मानवता का दीप जलेगा, तब मेरी इस रक्तरंजित साड़ी का हर दाग धुलेगा।"

इतना कहकर माँ मुस्काईं, आँखों में उम्मीद जगी, फिर धीरे-धीरे ओझल होकर सपनों की दुनिया में खो गईं।

नींद खुली तो मन में गूँजा, माँ का वह संदेश महान— "भारत केवल भूमि नहीं है, भारत हम सबकी पहचान।

आओ मिलकर प्रण यह लें, नफरत का अंधकार हरेंगे, अपने कर्मों और प्रेम से, भारत माता के घाव भरेंगे।"

जय हिन्द! 🇮🇳

— विजय शर्मा ऐरी

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