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ये कैसा इंसाफ़ था?

भूमिका — एक सच्ची घटना से…

यह कविता किसी कल्पना की कहानी नहीं,

बल्कि एक ऐसी सच्ची घटना से प्रेरित है,

जिसमें एक इंसान ने अपनी ज़िंदगी के 20 साल जेल की सलाखों के पीछे गुज़ार दिए।

23 वर्ष की उम्र में जेल गया…

और 43 वर्ष की उम्र में बाहर आया।

इन वर्षों के दौरान उसके माँ-बाप दुनिया से चले गए और भाई भी उसे छोड़कर चला गया।

जब वर्षों बाद वह जेल से बाहर आया,

तो उसके पास आज़ादी तो थी…

लेकिन खोया हुआ बचपन, जवानी, परिवार

और बीस साल का समय वापस नहीं था।

कहा जाता है कि बाद में वह निर्दोष साबित हुआ।

ऐसी घटना हमें सिर्फ़ एक सवाल नहीं देती,

बल्कि व्यवस्था और न्याय के सामने एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा करती है—

**“अगर कोई निर्दोष होकर भी 20 साल सज़ा भुगत ले,

तो उन बीते वर्षों का इंसाफ़ कौन करेगा?”**

इसी सवाल से जन्म लेती है यह कविता—

“ये कैसा इंसाफ़ था?” 💔

ये कैसा इंसाफ़ था?

✍️ डॉ. सुरक सेल्वी चिन्नप्पन

तेईस की उम्र में जेल गया,

तैंतालीस में बाहर आया…

बीच के बीस सालों ने

उससे उसका पूरा जीवन छीन लिया।

माँ-बाप दुनिया से चले गए,

भाई भी रोते-रोते चला गया,

जिस घर की चौखट पर

कभी लौटने का सपना देखा था,

वहाँ लौटकर भी

वो अपनों को न पा सका।

एक आरोप लगा था कभी,

और ज़िंदगी सज़ा बन गई…

सच क्या था, झूठ क्या था,

ये बात वर्षों में कहीं दब गई।

जिस उम्र में हाथों में

सपने होने चाहिए थे,

उस उम्र में सलाखें थीं…

जिस उम्र में माँ की गोद चाहिए थी,

उस उम्र में तन्हाइयाँ थीं।

और जब सच सामने आया,

तो सवाल सिर्फ़ इतना नहीं था—

“निर्दोष कौन था?”

सवाल ये था कि

जो बीस साल लौटकर नहीं आएँगे,

उनका हिसाब कौन देगा?

माँ की आख़िरी साँसों का,

पिता की सूनी आँखों का,

भाई के टूटे हुए दिल का,

और उस इंसान की जवानी का—

क्या कोई मुआवज़ा हो सकता है?

कानून ज़रूरी है,

न्याय ज़रूरी है,

पर न्याय के नाम पर

किसी निर्दोष की ज़िंदगी

अंधेरे में नहीं खोनी चाहिए।

क्योंकि फैसला सिर्फ़

कागज़ पर नहीं होता…

कभी-कभी एक फैसला

पूरे परिवार की किस्मत लिख देता है।

आज वो जेल से बाहर है,

मगर क्या सच में आज़ाद है?

जिसने बीस साल खो दिए,

उसके लिए बताइए—

ये कैसा इंसाफ़ था?

सलाखें खुल गईं…

लेकिन जो समय चला गया,

वो वापस नहीं आया। 💔

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