
अब प्रजा हुई दुखारी है,
राजा की मति मारी है।
मंत्रिमंडल हुक्म चलाता है,
राजा को इशारे पर नचाता है।
त्राहिमाम अब मचा हुआ है,
धन-दौलत कुछ न बचा हुआ है।
सबके जीवन पर संकट छाया,
ये कैसा बंधन आया है?
महँगाई ने कमर तोड़ दी,
भूख ने हर उम्मीद छोड़ दी।
मेहनत करने वाला रोता है,
सुख का सपना दूर ही होता है।
सिंहासन पर बैठे हैं राजा,
पर शासन पर किसका है कब्जा?
नीति बने बंद कमरों में,
जनता पिसती है गलियारों में।
जो सच बोले, वह दोषी ठहरे,
जो चुप बैठे, उसके दिन बहरे।
न्याय अगर बिकने लग जाए,
तो लोकतंत्र भी क्या बच पाए?
प्रजा पुकारे—सुनो महाराज,
मत करो जनता से कपट आज।
राजा वही जो दुख को जाने,
प्रजा के आँसू अपने माने।
जिस दिन जनता जाग जाएगी,
हर झूठी दीवार गिराएगी।
सत्ता चाहे जितनी भारी हो,
जनता सबसे बड़ी सवारी हो।
इंजीनियर राजन सोनी
अम्बेडकर नगर उत्तर प्रदेश