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बहू नहीं... बेटी की उम्मीद थी

जामनगर की वास्तविक घटना से प्रेरित

यह कविता जामनगर में सामने आई एक हालिया दर्दनाक घटना से प्रेरित है।

रिपोर्टों के अनुसार, एक परिवार को लंबे समय तक यह विश्वास दिलाया गया कि उनका बेटा काम के सिलसिले में ऑस्ट्रेलिया गया है। बाद में हुई जांच में उसकी मौत से जुड़ा कथित अपराध सामने आया। मामला पुलिस जांच और कानूनी प्रक्रिया के अधीन है।

इस कविता का उद्देश्य किसी स्त्री या पुरुष को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि विवाह में विश्वास, वफ़ादारी, इंसानियत और जीवन के मूल्य को याद दिलाना है।

🌹 बहू नहीं... बेटी की उम्मीद थी

हर माँ ने सोचा था...

घर में एक बहू नहीं,

एक बेटी आएगी...

हर पिता ने सोचा था...

मेरा बेटा अब अकेला नहीं रहेगा,

उसे जीवनभर का सच्चा हमसफ़र मिलेगा...

शहनाइयाँ बजीं,

सात फेरे हुए,

सपनों से सजा था वह घर...

पर किसे पता था,

कि मुस्कुराते चेहरे के पीछे

इतना गहरा अँधेरा छिपा होगा।

एक परिवार ने

विश्वास का दरवाज़ा खोला,

लेकिन बदले में

उन्हें उम्रभर का सन्नाटा मिला।

आज फिर एक माँ पूछ रही है—

"मेरे बेटे का कसूर क्या था?"

आज फिर एक पिता की आँखों में

सिर्फ़ आँसू हैं...

समाज से मेरी बस एक विनती है—

अगर रिश्ता निभा नहीं सकते,

तो सच कह दीजिए...

अगर दिल कहीं और है,

तो किसी की ज़िंदगी से मत खेलिए...

शादी कोई समझौते का कागज़ नहीं,

यह दो परिवारों का विश्वास है।

याद रखिए...

एक बेटे की मौत

सिर्फ़ एक इंसान की मौत नहीं होती,

उसके साथ

एक माँ की दुनिया,

एक पिता का सहारा,

एक बहन की राखी,

और पूरे परिवार की मुस्कान भी टूट जाती है।

आइए ऐसा समाज बनाएँ,

जहाँ बहू बनकर आने वाली

हर बेटी विश्वास निभाए,

और हर बेटा भी

सम्मान और प्रेम से रिश्ता निभाए।

क्योंकि विवाह का अर्थ

प्रेम, विश्वास और ज़िम्मेदारी है—

धोखा, हिंसा और किसी की ज़िंदगी छीनना नहीं।

🌹 प्रार्थना:

ईश्वर किसी भी माँ की गोद सूनी न करे,

किसी भी परिवार को ऐसा दर्द न दे,

और हमारे समाज में रिश्तों का सम्मान

हमेशा बना रहे।

कानून अपना फैसला देगा,

लेकिन जिस परिवार ने अपना बेटा खोया है,

उसे वह बेटा कभी वापस नहीं मिलेगा।

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