
🌹बेटी को डर नहीं, सुरक्षित आसमान चाहिए 🌹
वो बेटी है किसी की,
किसी माँ की धड़कन है,
किसी पिता की आँखों का सपना,
किसी भाई की प्यारी बहन है।
जब वो घर से निकलती है,
माँ बस इतना कहती है—
“जल्दी लौट आना…”
पर उस छोटे-से वाक्य में
एक माँ की पूरी दुनिया की चिंता होती है।
आज डर केवल सड़कों पर नहीं,
कभी किसी अनजान चेहरे में मिलता है,
तो कभी मोबाइल की उस स्क्रीन पर,
जहाँ एक तस्वीर भी
गलत हाथों में पहुँच जाती है।
उसकी तस्वीर पर अधिकार उसका हो,
उसकी पहचान का सम्मान उसका हो,
उसकी ‘ना’ को ‘ना’ समझा जाए,
और उसकी खामोशी को भी सुना जाए।
बेटी को यह मत सिखाओ
कि दुनिया से डरकर जीना है,
उसे इतना सक्षम बनाओ
कि गलत के सामने खड़ी होकर कह सके—
“मैं कमजोर नहीं,
मैं अपने सम्मान की रखवाली खुद हूँ।”
और ऐ समाज…
हर बार बेटी को ही मत समझाना,
कभी बेटों को भी समझाना—
नज़र में संस्कार रखो,
व्यवहार में इंसानियत रखो।
क्योंकि किसी की बेटी को सुरक्षित रखना
सिर्फ़ कानून की जिम्मेदारी नहीं,
हमारे चरित्र और संस्कार की पहचान है। ❤️
जिस दिन कोई बेटी
घर लौटते समय पीछे मुड़कर
डर के कारण नहीं देखेगी,
जिस दिन उसकी मुस्कान में
किसी अनहोनी का डर नहीं होगा,
उस दिन समझना—
हमने सच में एक बेहतर समाज बनाया है। 🌷
🌿 Moral | संदेश
बेटियों को पंख देना ही पर्याप्त नहीं,
उन्हें ऐसा आसमान देना भी हमारी जिम्मेदारी है
जहाँ उनकी उड़ान सुरक्षित हो।
बेटी की सुरक्षा किसी एक घर की नहीं,
पूरे समाज की जिम्मेदारी है। 🕊️❤️
✍️ लेखिका
Dr. Surak Selvi Chinnappan