
मुझे ऐसा भारत चाहिए 🇮🇳
रिश्ते सिर्फ़ नाम के नहीं,
उन्हें निभाने का साहस चाहिए,
जहाँ “पति-पत्नी” कहने से पहले
एक-दूसरे के दर्द को समझने का एहसास चाहिए।
किसी ने रिश्ता बचाने को हाथ बढ़ाया,
तो उसे अदालत का रास्ता नहीं—
एक बार बैठकर बात करने का अवसर मिले,
क्योंकि टूटते रिश्ते सिर्फ़ दो दिल नहीं तोड़ते,
कभी-कभी एक पूरे परिवार का बचपन छीन लेते हैं।
बच्चों से यह मत पूछो—
“तुम कितने नंबर लाए?”
कभी यह भी पूछ लेना—
“तुम अंदर से कैसे हो?”
क्योंकि एक परीक्षा में मिली हार
पूरी ज़िंदगी की हार नहीं होती,
एक अंकतालिका से
किसी बच्चे की कीमत तय नहीं होती।
मुझे ऐसा भारत चाहिए
जहाँ बेटी घर से निकलते समय
डर को साथ लेकर न चले,
जहाँ उसकी आज़ादी
सिर्फ़ 15 अगस्त के भाषणों में नहीं,
हर दिन उसकी ज़िंदगी में दिखे।
मुझे ऐसा भारत चाहिए
जहाँ गरीबी किसी के सपनों की दुश्मन न बने,
जहाँ भेदभाव किसी बच्चे के भविष्य की दीवार न बने,
जहाँ हर हाथ को अवसर मिले
और हर इंसान को सम्मान मिले।
जहाँ कोई बच्चा
रिश्तों की गलतियों की सज़ा में
अनाथ न हो,
जहाँ किसी की मजबूरी
उसे अकेलेपन के अंधेरे में न धकेले।
और अगर कोई गिर जाए—
तो उसे धक्का मत देना,
अपना हाथ बढ़ाना।
अगर कोई हार जाए—
तो उसे “नाकाम” मत कहना,
उसे फिर से कोशिश करने का हौसला देना।
अगर कोई रो रहा हो—
तो उसके आँसू कमज़ोरी मत समझना,
शायद वह बहुत लंबे समय से मजबूत बना हुआ है।
क्योंकि मुझे ऐसा भारत चाहिए
जहाँ रिश्ते इंसान को तोड़ें नहीं, जोड़ें;
जहाँ शिक्षा डर नहीं, उम्मीद दे;
जहाँ आज़ादी केवल झंडे में नहीं,
हर बेटी की आँखों में दिखाई दे।
मुझे ऐसा भारत चाहिए—
जहाँ हारने वाले को धक्का नहीं, हाथ मिले,
टूटने वाले को ताना नहीं, साथ मिले,
और रोते हुए इंसान को
“कमज़ोर” नहीं,
एक इंसान समझा जाए।
क्योंकि सच्चा विकसित भारत
सिर्फ़ ऊँची इमारतों से नहीं बनेगा—
वह तब बनेगा,
जब हर इंसान सुरक्षित होगा,
हर बच्चा सुना जाएगा,
हर बेटी सम्मान से जिएगी,
और हर टूटे दिल को
फिर से जीने की वजह मिलेगी।
🌿 Moral / संदेश
“देश की असली आज़ादी तब होगी,
जब इंसान रिश्तों के डर से नहीं,
सम्मान और विश्वास के साथ जी सके।
किसी को गिराना आसान है—
लेकिन किसी गिरे हुए को उठाना ही
इंसानियत है।
आइए, ऐसा भारत बनाएँ
जहाँ कोई इंसान अकेला होकर न टूटे,
बल्कि मुश्किल समय में
किसी का हाथ उसे थामने के लिए मौजूद हो।” 🇮🇳❤️
— डॉ. सुरक सेल्वी चिन्नप्पन