शादी कोई खेल नहीं...
एक माँ ने नौ महीने तक
जिस धड़कन को अपनी धड़कनों में पाला था,
आज वही बेटा
मिट्टी की खामोशी में सो गया...
एक पिता की उम्मीद,
एक बहन की राखी,
एक भाई का सहारा...
सब एक पल में उजड़ गया।
शादी तो दो आत्माओं का
जीवनभर का वचन होती है,
फिर क्यों आज
कुछ लोग इसे एक खेल समझ बैठे हैं?
अगर साथ निभाना नहीं था,
तो सच कह देते...
रास्ते अलग कर लेते,
पर किसी की साँसें छीनने का
हक़ किसने दिया?
एक जान चली जाए,
तो केवल एक इंसान नहीं मरता...
उसके साथ
एक माँ की दुनिया,
एक पिता का अभिमान,
एक बहन की मुस्कान,
और पूरे परिवार की उम्मीदें भी दफ़न हो जाती हैं।
रिश्ते विश्वास से बनते हैं,
धोखे से नहीं।
शादी ज़िम्मेदारी है,
सात फेरों की पवित्र प्रतिज्ञा है,
न कि किसी की ज़िंदगी का अंत लिखने का अधिकार।
आज समाज से बस इतना कहना है—
अगर प्रेम नहीं बचा,
तो अलग हो जाओ...
अगर विश्वास टूट गया,
तो सच बोल दो...
लेकिन किसी की साँसें मत छीनो।
क्योंकि...
ज़िंदगी ईश्वर का दिया हुआ सबसे अनमोल उपहार है।
इसे छीनने का अधिकार किसी इंसान को नहीं।
संदेश:
रिश्ते निभ नहीं सकते तो उन्हें सम्मान के साथ समाप्त कीजिए, लेकिन किसी की ज़िंदगी कभी मत छीनिए। हर बेटा किसी माँ की दुनिया होता है, हर भाई किसी परिवार की ताकत। विवाह का अर्थ विश्वास, सम्मान और जीवनभर की ज़िम्मेदारी है—हिंसा नहीं। :::**