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मै हार जाऊं कैसे

मैं हार जाऊँ कैसे, किसी का एहसान बाकी है,
मैं भाग जाऊँ कैसे, किसी का अभिमान बाकी है।

अभी तो माँ की आँखों में, मुझे उम्मीद दिखती है,
अभी तो बाप के सपनों का, थोड़ा मान बाकी है।

गिरा हूँ, टूटकर भी मैं, मगर बिखरा नहीं अब तक,
मेरे सीने में लड़ने का, अभी अरमान बाकी है।

भले ही राह मुश्किल है, भले मंज़िल भी दूर बहुत,
मेरी साँसों में जीने का, अभी ईमान बाकी है।

जो मुझको छोड़कर बोले—“तू अब कुछ कर नहीं सकता”,
उन्हें बतला दूँगा एक दिन—मेरा तूफान बाकी है।

मैं हारूँगा नहीं हरगिज़, अभी कहानी अधूरी है,
मेरी किस्मत के पन्नों पर, नया ऐलान बाकी है।

✍️ इंजीनियर राजन सोनी "निर्मय"

मै हार जाऊं कैसे

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