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तेरा आख़िरी संदेश

तेरा आख़िरी संदेश

तेरा आख़िरी संदेश

किसी ख़त की तरह नहीं आया था,

वो तो एक काग़ज़ था…

जिस पर कुछ कानूनी शब्द लिखे थे,

और उन शब्दों के बीच

हमारी पूरी ज़िंदगी ख़ामोश खड़ी थी।

कभी इसी रिश्ते की शुरुआत

दुआओं से हुई थी,

आँखों में सपने थे,

दिल में भरोसा था,

और होंठों पर बस एक ही बात—

“साथ हमेशा रहेगा…”

मैंने तेरे साथ

सिर्फ़ ख़ुशियाँ नहीं माँगी थीं,

मैंने तेरे साथ

मुश्किल दिनों को भी अपनाया था।

सोचा था,

वक़्त बदलेगा…

दूरी मिटेगी…

ख़ामोशी टूटेगी…

और एक दिन

तू लौटकर कहेगा—

“चलो, फिर से शुरुआत करते हैं।”

लेकिन…

तेरा आख़िरी संदेश

मेरे हाथों में आया

तो उसमें

“फिर से शुरुआत” नहीं थी,

उसमें था—

रिश्ता ख़त्म करने का फ़ैसला।

कितनी अजीब बात है ना…

जिस रिश्ते को निभाने में

एक उम्र लग जाती है,

उसे ख़त्म करने के लिए

बस कुछ पन्ने काफ़ी होते हैं।

तूने शायद

एक नोटिस भेजा था,

लेकिन मेरे पास

सिर्फ़ काग़ज़ नहीं आया था…

मेरे पास आया था

उन सपनों का अंत,

जिन्हें मैंने

बहुत संभालकर रखा था।

उस दिन

मैंने पहली बार जाना—

कभी-कभी इंसान

किसी के जाने से नहीं टूटता,

वो उस भरोसे के टूटने से टूटता है

जिसे उसने पूरी ईमानदारी से जिया था।

फिर भी…

मैं तुझे बद्दुआ नहीं दूँगी।

क्योंकि मोहब्बत अगर सच्ची थी,

तो उसका अंत भी

नफ़रत से क्यों हो?

मैं बस इतना कहूँगी—

तेरा आख़िरी संदेश

मेरी कहानी का आख़िरी पन्ना हो सकता है,

लेकिन मेरी ज़िंदगी का आख़िरी पन्ना नहीं।

तूने रिश्ता ख़त्म करने का

फ़ैसला काग़ज़ पर लिख दिया,

मैंने उसी काग़ज़ के पीछे

अपनी नई ज़िंदगी लिखनी शुरू कर दी।

अब तेरे संदेश का जवाब

मेरे आँसू नहीं देंगे…

मेरा संभल जाना देगा।

क्योंकि कुछ रिश्ते

हमारी मंज़िल नहीं होते,

वे हमें

हमारी अपनी पहचान तक पहुँचाने वाले

सबसे कठिन रास्ते होते हैं।

और शायद…

तेरा आख़िरी संदेश

मेरे लिए अंत नहीं था—

वो उस स्त्री की शुरुआत थी,

जो टूटकर भी

ख़ुद को फिर से जोड़ना जानती थी।

मोरल

हर आख़िरी संदेश अंत नहीं होता।

कभी-कभी वही संदेश

हमें उस ज़िंदगी की ओर मोड़ देता है,

जहाँ हमें किसी के साथ की नहीं,

सबसे पहले अपनी आत्मा की आवाज़ की ज़रूरत होती है।

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